Tuesday, October 29, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

यशवंत सिन्हा आगे बताते हैं, ' मैंने अपने राजदूत रघुनाथ से कहा कि आप तुरंत गाड़ी मंगवाइए. मैं वापस अपने होटल जाउंगा. हम लोग उस भवन से पैदल ही बाहर निकल लिए. हमने सोचा कि अगर हमारी कार नहीं भी मिली तो हम टैक्सी ले कर अपने होटल चले जाएंगे.
जब हम क्रेमलिन से वॉक आउट कर रहे थे तो दो रूसी पदाधिकारी दौड़ते हुए आए. वो माफ़ी माँगने लगे लेकिन मैंने उनकी एक नहीं सुनी और हम वापस अपने होटल पहुंच गए.
होटल पहुंचते ही रूस के विदेशमंत्री इवानोव का मेरे पास फ़ोन आया कि मुझे बहुत फ़सोस है कि आपके साथ इस तरह का व्यवहार हुआ. मैंने कहा कि मैं भी बहुत दुखी हूँ और अब तो मैं प्रतिनिधिमंडल स्तर वाली बैठक में भी भाग लेने नहीं आ रहा हूँ.
उन्होंने कहा 'नही नहीं आप आइए. मैं खुद आपको लेने आपके होटल आ रहा हूँ.' फिर वो खुद मुझे लेने आए होटल, तब मैं उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गया. जब हम लोग क्रेमलिन पहुंचे तो दोनों प्रतिनिधिमंडलों का एक दूसरे से परिचय करवाया जा रहा था. हम भी लाइन में खड़े हो गए.
वो वॉक आउट मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं भी प्रॉटोकॉल का बहुत बड़ा अनुयायी हूँ. मेरा माना है कि भारत दूसरे देशों के प्रतिनिधियों के साथ उसी तरह का व्यवहार करे जैसा दूसरे देशों में भारत के लोगों के साथ होता है. रूस में जब मेरे साथ ये घटना घटी तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया. '
यशवंत सिन्हा ने 2009 का चुनाव जीता, लेकिन 2014 में उन्हें बीजेपी का टिकट नहीं दिया गया. धीरे धीरे नरेंद्र मोदी से उनकी दूरी बढ़ने लगी और अंतत: 2018 में 21 वर्ष तक बीजेपी में रहने के बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
यशवंत सिन्हा बताते हैं, 'हाँलाकि मैंने इस बात की हिमायत की थी कि मोदीजी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाए लेकिन 2014 का चुनाव आते आते मुझे इस बात का आभास हो गया था कि इनके साथ चलना मुश्किल होगा. इसलिए मैंने तय किया कि मैं चुनाव लड़ूंगा ही नहीं.
पार्टी ने मेरी जगह मेरे बेटे को उस सीट का ऑफ़र दिया. वो जीते और मोदीजी ने उन्हें मंत्री भी बनाया. हाँलाकि ब वो मंत्री नहीं हैं 2019 का चुनाव जीतने के बाद भी. इसके बाद भी मैं मोदीजी को सुझाव देता रहा.
अलग अलग मुद्दों पर उन्हें पत्र लिखता रहा. हमारा उनका फ़ासला बढ़ा कश्मीर के मुद्दे को ले कर. मैं चाहता था कि काश्मीर में वाजपेईजी की नीतियों का अनुसरण हो. उनकी नीति थी इंसानियत, जमहूरियत और कश्मीरियत.
'मेरा मानता था कि कश्मीर में सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जाए. वाजपेई जी के समय में हुर्रियत तक से बातचीत हुई थी.'
यशवंत सिन्हा आगे कहते हैं, 'जब कश्मीर बहुत अशाँत हो गया था 2016 में तो हम कश्मीर गए थे एक समूह के साथ. मैं जब कश्मीर दोबारा गया दिसंबर, 2016 में तो मुझे लगा कि एक रास्ता निकल सकता है. मैंने श्रीनगर से ही प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए फ़ोन लगा कर कहा कि मैं उने मिलना चाहता हूँ.'
'उसके बाद मैंने कई बार उनसे मिलने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने मुझे कभी समय नहीं दिया. मैं गृह मंत्री से भी मिला. वहाँ से भी मुझे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला. जब मेरे अंदर सवाल उठा कि ये लोग कश्मीर में क्यों बातचीत और शाँति का रास्ता नहीं अपनाना चाहते?'
'फिर मैंने दो साल पहले भारत की आर्थिक स्थिति के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा था. अगर उस समय मेरी बात को सुना जाता तो भारतीय अर्तव्यवस्था की वो स्थिति नहीं होती जो आज है. लेकिन बात सुनने की बात तो दूर रही, मेरे बारे में कहा गया कि ये 80 साल की उम्र में नौकरी तलाश रहे हैं.'

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